बिहार विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को अपना मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किया है। लेकिन, यह निर्णय होने में बहुत देर हो गयी। कांग्रेस और राजद के बीच सीट बंटवारे को लेकर जिस तरह की खींचतान चली, उसका संदेश अच्छा नहीं गया। एनडीए की भी कमोबेश वही स्थिति रही। उसके शीर्ष नेता यह तो कह रहे हैं कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं। बहरहाल, महागठबंधन के घटक दलों ने तेजस्वी के नाम पर मुहर लगा कर एकजुटता का संदेश देने का प्रयास किया है। दरअसल, कांग्रेस और राजद के बीच ही सीट शेयरिंग का असली पेंच फंसा था। इस देरी से महागठबंधन में असमंजस बढ़ रहा था। स्थिति तब और विचित्र हो गयी जब मुकेश सहनी ने कह दिया कि महागठबंधन थोड़ा अस्वस्थ है। इससे यही संकेत मिला कि बात नहीं बन पा रही है। कांग्रेस की तरफ से कभी भी तेजस्वी के नाम का सीधा विरोध नहीं किया गया, बस! सहमति नहीं जतायी जा रही थी। वैसे, यह लगभग स्पष्ट था कि तेजस्वी ही सीएम फेस होंगे। घोषणा तो केवल औपचारिकता होगी। ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि महागठबंधन के सभी साथी किसी दूसरे नाम पर सहमत नहीं हो पा रहे थे। इस घोषणा में देरी की एक बड़ी वजह यह भी थी कि कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सीटों पर अपना दावा पेश करना चाहती थी। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 70 सीटें मिली थीं, लेकिन जीत केवल 19 पर मिली थी। इसलिए, पार्टी इस बार अधिक…और, जीतने की सम्भावना वाली सीटें चाहती थी। इस बातचीत में बहुत समय लग गया। ऐसे में अब यदि तेजस्वी के नाम पर एकता प्रदर्शित नहीं की जाती, तो महागठबंधन के बिखरने का खतरा बढ़ जाता। हालांकि, कुछ सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ यानी आपसी सहमति से चुनाव लड़ा जा रहा है। सीट बंटवारे की घोषणा पहले करके एनडीए ने जो बढ़त हासिल की थी, महागठबंधन ने अब उसे कवर करने का प्रयास किया है। विगत दो दशक में यह पहला ऐसा चुनाव है जब नीतीश कुमार गठबंधन का नेतृत्व तो कर रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद का चेहरा होने के नाम पर उन्हें नाकुर-नुकुर का सामना करना पड़ा है। ऐसे में महागठबंधन ने अपना नेता घोषित कर स्वाभाविक रूप से एनडीए पर दबाव बढ़ा दिया है। बिहार का यह चुनाव कई मायनों में अलग है। नीतीश सरकार की घोषणाओं के जवाब में तेजस्वी यादव ने भी वादों की झड़ी लगा दी है। 28 अक्टूबर को आये महागठबंधन के घोषणापत्र में ऐसे कई वादे देखने को मिले हैं। बहरहाल, तेजस्वी यादव के नाम पर महागठबंधन के सभी दलों का सहमत होना चुनाव की दृष्टि से लाभक्षप्रद है। यह निर्णय महागठबंधन के लिए एक बड़ी जीत है, क्योंकि इससे उनकी एकजुटता का संदेश पूरे बिहार में जायेगा। एनडीए ने पहले ही सीट बंटवारे की घोषणा कर दी थी। लेकिन, उन्होंने किसी एक चेहरे को सीएम उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं किया है। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार ही एनडीए का चेहरा रहे हैं। यह चुनाव बिहार के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। दोनों पक्षों की ओर से इसमें एक से बढ़ कर एक वादे किये जा रहे हैं। नीतीश सरकार ने कई घोषणाएं की हैं, वहीं तेजस्वी यादव ने भी जनता से अनेक वादे किये हैं। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि जनता सत्तारूढ़ दल के वादे पर भरोसा करती है या फिर विपक्ष के वादे पर। बिहार में किसकी सरकार बनती है और अगला मुख्यमंत्री कौन बनता है, यह 14 नवम्बर को मतगणना के साथ ही स्पष्ट हो जायेगा।
