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Home»राजनीति»बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते
राजनीति

बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते

avnpostBy avnpostOctober 29, 2025No Comments1 Min Read
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बैजनाथ मिश्र

छठ महापर्व संपन्न हो गया है. अब बिहार में चुनाव की रंगत चटक होने लगी है. लहरदार गानों से मनोरंजन बढ़ रहा है. हेलीकॉप्टर गर्दा उड़ाने लगे हैं. भोंपू कान का पर्दा फाड़ने लगे हैं. दावों-प्रतिदावों से पब्लिक कन्फ्यूजियाने लगी हैं. भावनाओं के बाजार सजाये जाने लगे हैं. विविधवर्णी शकुनि बाजी जीतने के लिए छल-छद्म के पांसे फेंकने लगे हैं. दृश्य परिदृश्य थोड़ा साफ होने लगा है. कहीं यारी है तो कहीं गद्दारी. कहीं दागी हैं, कहीं बागी और मजबूरी में बने त्यागी भी हैं. सबसे खास खबर यह है कि छठ शुरु होने से पहले ही लालू प्रसाद की मनोकामना पूर्ण हो गयी है. उनके लाडले तेजस्वी को महागंठबंधन ने अपना भावी मुख्यमंत्री मान लिया है. उनके साथ ही मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम घोषित कर दिया गया है. इसलिए ये दोनों रणबांकुरे कोपभवन से बाहर निकलकर पूरे मनोयोग से वेग-संवेग के साथ चुनाव प्रचार में जुट गये हैं. इनकी नाराजगी दूर करने की जिम्मेदारी कांग्रेस पर थी. लेकिन राहुल गांधी तेजस्वी को बतौर सीएम प्रोजेक्ट करने को तैयार नहीं थे. उन्हें समझा दिया गया था कि तेजस्वी को आगे करने से जंगलराज का भभूका मंडराने लगेगा.  तेजस्वी लालू प्रसाद की सियासत की विरासत संभालेंगे तो उनकी करनी-भरनी की जिम्मेदारी दूसरा कौन उठायेगा? इसलिए सीएम घोषित कर चुनाव में उतरने का प्रस्ताव टाला जा रहा था. राजद को कांग्रेस पर भरोसा नहीं हो रहा था. दोस्ती में खटास बढ़ रही थी. तेजस्वी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा कर चुके थे, लेकिन राहुल उन्हें सीएम घोषित करने को तैयार नहीं थे. इससे तेजस्वी का बिदकना स्वाभाविक था.  छह अक्टूबर के बाद वह दो दिन दिल्ली में रहे और एक दिन नामांकन करने राघोपुर गये. बाकी प्रंद्रह-सतरह दिन वह घर में दुबके रहे. जब एनडीए का चुनाव प्रचार शुरु हो गया तब गंठबंधन के नेताओं का माथा ठनका. दिल्ली से कांग्रेस के हरकारे दौड़ाये गये. अशोक गहलोत लालू प्रसाद से मिले. लालू ने साफ कर दिया कि जब वामपंथी दल और मुकेश सहनी तेजस्वी को सीएम फेस मानने को तैयार हैं, तब कांग्रेस ना-नुकुर क्यों कर रही है. यह संकेत धमकी भरा था.  कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदली या फिर डर गई, यह तो उसके प्रवक्ता-नेता ही बतायेंगे, लेकिन 23 अक्टूबर को एक प्रेस कांफ्रेंस आयोजित हुई. गंठबंधन के नेता बैठे. अशोक गहलोत ने तेजस्वी को सीएम और मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम प्रोजेक्ट कर दिया. उस साझा प्रेस कांफ्रेंस में फोटो सिर्फ तेजस्वी का था, न राहुल थे, न कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष. साथ ही राजद के खिलाफ खड़े कांग्रेस प्रत्याशियों को हटा लिया गया. जबकि राजद ने अपना कोई प्रत्याशी नहीं हटाया.  इस खबर के पसरने के बाद नेरेटिव बनने लगे, गढ़े जाने लगे. एक नेरेटिव यह है कि कांग्रेस ने तेजस्वी को फंसा दिया है. कांग्रेस को भरोसेमंद सूचना मिल गई है कि एनडीए जीत रहा है, इसलिए हार का ठीकरा फूटना है तो तेजस्वी का माथा आगे कर दो. दूसरा नेरेटिव यह कि कांग्रेस ने सरेंडर कर दिया है. राजद ने तेजस्वी को नेता मानने के लिए कांग्रेस को मजबूर कर दिया है.  लेकिन इन दोनों के बीच एक मासूम सा सवाल यह है कि जब राजद करीब डेढ़ सौ सीटों पर लड़ रहा है तब क्या तेजस्वी स्वाभाविक रूप से गंठबंधन के नेता और सीएम के दावेदार नहीं थे? इसे मानने या समझने में कांग्रेस ने  ना ना करके प्यार हमीं से कर बैठे  का बचकाना खेल क्यों किया?  जो घोषणा अशोक गहलोत ने 23 अक्टूबर को की, वह चुनाव की डुगडुगी बजने के साथ ही राहुल गांधी के मुखारविंद से हो जाती तो क्या बिगड़ जाता? तब न कोई नेरेटिव बनता, न फजीहत होती, न चुनाव प्रचार में विलंब होता. इसी को कहते हैं बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते.  दरअसल, कांग्रेस के नये रणनीतिकारों, सिपहसलारों ने क्षेत्रीय दलों को कमजोर करने की योजना पर काम शुरु कर दिया है. क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस की ही जमीन खरोंच कर अपनी सियासी इमारत खड़ी की है. बिहार के प्रभारी अल्लावरु कांग्रेस के लिए डीएम (दलित-मुस्लिम) गंठजोड़ पर काम कर रहे हैं. यह राजद के एमवाई (मुस्लिम-यादव) की काट है. अखिलेश सिंह की जगह राजेश राम को इसीलिए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.  लेकिन जब मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम बनाने की घोषणा के साथ किसी दलित या मुस्लिम को डिप्टी सीएम पद देने की घोषणा नहीं हुईं तो कांग्रेस की पकी-पकाई खिचड़ी जल गयी. यह बात अलग है कि भूल सुधार करते हुए इतना जरूर कहा गया कि कुछ अन्य जातियों से भी डिप्टी सीएम बनाये जायेंगे. लेकिन गंठबंधन एक मौका चूक गया है. यह तय है कि भाजपा को हराने के लिए मुस्लिम किसी को भी वोट दे देंगे, लेकिन गंठबंधन बिहार के बीस फीसदी दलितों पर डोरे डालने में चूक गया. इनमें पांच फीसदी दलित पासवान समाज के हैं जो चिराग के कारण एनडीए की ओर मुखातिब है. इसी प्रकार करीब पांच फीसदी महादलितों के नेता बने जीतनराम मांझी भी एनडीए के साथ खड़े हैं. लेकिन पांच फीसदी रविदासी समाज के राजेश राम (कांग्रेस) को भावी डिप्टी सीएम प्रोजेक्ट कर गंठबंधन आकर्षित कर सकता था. इससे फुटकर पांच फीसदी दलितों को समेटने में भी आसानी होती.  बहरहाल अब ओवैसी जेसे नेता सवाल उठा रहे हैं कि यदि चौदह फीसदी वाला सीएम और दो फीसदी वाला डिप्टी सीएम का दावेदार हो सकता है तो क्या अठारह फीसदी मुसलमान केवल दरी बिछाएंगे?  इस बीच गंठबंधन की ओर से एक शिगूफा छोड़ा गया. वह यह कि चुनाव बाद एनडीए जीता तो भाजपा नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी. 23 अक्टूबर वाली प्रेस कांफ्रेंस में अशोक गहलोत ने कहा था कि अब एनडीए अपना सीएम चेहरा घोषित करे. हालांकि जिस समय गहलोत यह मांग कर रहे थे, उसी समय छपरा (सारण) के अमनौर विधानसभा क्षेत्र की एक चुनावी सभा में नीतीश की मौजूदगी में स्थानीय सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी जनता से नारा लगवा रहे थे- “नीतीश सीएम थे, हैं और रहेंगे.  अगर गंठबंधन को यह नारा नाकाफी लगता है तो मूल प्रश्न यह है कि क्या नीतीश “यारो दूल्हा बनाओ” कहते हुए कोपभवन में गये और चुनाव प्रचार में तेजस्वी की तरह निकले ही नहीं? वह तो बिना कहे-पूछे रोज तीन-चार जनसभाएं कर रहे हैं. वह जानते हैं कि यह जनादेश उनकी सरकार के कामकाज पर होगा और यदि एनडीए हारता है तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ उनकी होगी. इसलिए उन्हें कोई कमजोर, असहाय या अस्वस्थ कुछ भी कहे, वह बिना रूके-बिना थके चुनाव अभियान चला रहे हैं और शासन-प्रशासन की कमान भी थामे हुए हैं.  दूसरी बात यह है कि एनडीए में उनका विकल्प क्या है? क्या भाजपा में कोई ऐसा नेता है जो मुख्यमंत्री के लायक है? क्या पार्टी ने किसी को इस हिसाब से तैयार किया है? इस पर बाद में चर्चा होगी. लेकिन सवाल यह है कि नीतीश ने ऐसा कौन सा गलत काम किया है जो उनके नेतृत्व में किसी पार्टी को काम करने में संकोच होगा?  अगर यह मान भी लिया जाये कि पिछले बीस वर्षों में उन्होंने कुछ खास नहीं किया है, शिक्षा , स्वास्थ्य की हालत अब भी डंवाडोल है, बेरोजगारी कम नहीं हुई है, पलायन जारी है और प्रशासन भ्रष्टाचार में लिप्त है, तब भी यह सवाल उठता है कि उन्होंने बिहार का बिगाड़ा क्या है और अपने तथा अपने परिवार के लिए कितनी संपत्ति बनायी है? यानी जो बैगेज लेकर तेजस्वी यादव बिहार बनाने निकले हैं, उसका छटांक भर न नीतीश के पास है और ना ही उनके साथ खड़े नरेंद्र मोदी के पास. चौदह नवंबर को जनता क्या फैसला सुनएगी, इसका इंतजार करना होगा, लेकिन तेजस्वी-नीतीश की तुलना बौद्धिक बेईमानी के अतिरिक्त कुछ नहीं है.  एनडीए के प्रचार मंच पर सभी साथी दलों के नेता मौजूद रहते हैं, लेकिन तेजस्वी सिर्फ सहनी के साथ रैलियां कर रहे हैं. वर्तमान में भी जद (यू) के मुकाबले भाजपा के विधायकों की संख्या लगभग दोगुनी है. फिर भी वह मुख्यमंत्री हैं और कहीं कोई खटपट नहीं है तो अटकलबाजियों की हकीकत एनडीए के सभी घटक दल और नेता बाखूबी जानते हैं. तभी तो इनका सामूहिक प्रचार चल रहा है और कांग्रेस प्रचार में तेजस्वी के साथ अपनी इंट्री के लिए रास्ता खोज रही है या जुगाड़ बैठा रही है. इस पूरे प्रकरण में कांग्रेस उघार हो गयी है.  बहरहाल ताजा खबर यह है कि राहुल गांधी चुनाव प्रचार के लिए मान गये हैं. मुजफ्फरपुर में उनकी पहली सभा प्रस्तावित है, पर यह साफ नहीं हो सका है कि उनके भावी मुख्यमंत्री साथ रहेंगे या नहीं.

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