रांची। अंजुमन इस्लामिया, रांची का कार्यकाल अगस्त 2025 में समाप्त हो चुका है, किंतु अब तक संस्था में निष्पक्ष, पारदर्शी एवं समयबद्ध चुनाव संपन्न नहीं हो सका है।
लगातार बढ़ते जन आक्रोश के बाद एक आवामी बैठक बुलाई गई, जिसमें सर्वसम्मति से मुफ्ती अनवर क़ासमी को चुनाव संयोजक नियुक्त किया गया। इस निर्णय को अंजुमन से जुड़े तमाम इदारों और सदस्यों ने स्वीकार किया। इसके बाद मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया आरंभ हुई। लंबे अंतराल के बाद 19 दिसंबर को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की गई, लेकिन प्रकाशित सूची में कई गंभीर त्रुटियां सामने आने की शिकायतों ने एक बार फिर संस्था में असंतोष और हंगामे की स्थिति पैदा कर दी।
दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इन आपत्तियों के बावजूद चुनाव संयोजक की ओर से न तो त्रुटियों के निराकरण की दिशा में कोई ठोस पहल दिखाई दे रही है और न ही चुनावी माहौल बनता हुआ नजर आ रहा है। दूसरी ओर झारखंड राज्य सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड भी पूरे घटनाक्रम पर आंख मूंदे हुए प्रतीत होता है।
गौरतलब है कि अंजुमन इस्लामिया, रांची एक पंजीकृत संस्था है, जिसका पंजीकरण झारखंड राज्य सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अंतर्गत है। इस कारण संस्था न केवल अपने आंतरिक संविधान एवं उपविधियों से, बल्कि वक़्फ़ अधिनियम, 1995 तथा उससे संबंधित नियमों से भी बंधी हुई है। इसके बावजूद चुनाव से जुड़ी गंभीर अनियमितताएं, प्रक्रियागत खामियां और सदस्यों की लगातार शिकायतों पर राज्य सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष की चुप्पी कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
न तो चुनाव प्रक्रिया को लेकर अब तक कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किया गया है और न ही त्रुटिपूर्ण मतदाता सूची पर कोई संज्ञान लिया गया है। यह मौन अंजुमन इस्लामिया, रांची में व्याप्त अव्यवस्था को अप्रत्यक्ष संरक्षण देने जैसा प्रतीत होता है।
अब अंजुमन इस्लामिया, रांची में व्याप्त चुनावी अनियमितताएं केवल एक आंतरिक मामला नहीं रह गई हैं, बल्कि यह लोकतांत्रिक अधिकारों, वक़्फ़ अधिनियम तथा विधि के शासन से जुड़ा एक गंभीर विषय बन चुका है। ऐसी स्थिति में राज्य सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड सहित सभी संबंधित प्राधिकरणों की यह जिम्मेदारी है कि वे समय रहते हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित करें, अन्यथा न्यायिक हस्तक्षेप ही एकमात्र विकल्प शेष रह जाएगा।
