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Home»राज्य»झारखंड»जाति प्रमाणपत्र में पति का नाम होने पर चयन से वंचित अभ्यर्थी को हाई कोर्ट से राहत, जेपीएससी को नियुक्ति की अनुशंसा का निर्देश
झारखंड

जाति प्रमाणपत्र में पति का नाम होने पर चयन से वंचित अभ्यर्थी को हाई कोर्ट से राहत, जेपीएससी को नियुक्ति की अनुशंसा का निर्देश

avnpostBy avnpostAugust 17, 2026No Comments3 Mins Read
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रांची। झारखंड उच्च न्यायालय ने जाति प्रमाणपत्र में पिता के बजाय पति का नाम दर्ज होने के कारण अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग में चयन से वंचित चंचला कुमारी को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति दीपक रौशन की अदालत ने उनकी रिट याचिका स्वीकार करते हुए झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) को आठ सप्ताह के भीतर नियुक्ति के लिए आवश्यक अनुशंसा करने का निर्देश दिया है। आयोग की अनुशंसा मिलने के बाद राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर नियुक्ति पत्र जारी करना होगा।
अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जाति प्रमाणपत्र जारी करने में यदि गलती सरकारी अधिकारी की है तो उसकी सजा अभ्यर्थी को नहीं दी जा सकती। सरकारी प्राधिकारी की प्रक्रिया संबंधी त्रुटि किसी अभ्यर्थी के संवैधानिक आरक्षण अधिकार को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकती, खासकर तब जब उसने अपनी श्रेणी में चयन के लिए निर्धारित अंक हासिल किए हों।
यह मामला 7वीं से 10वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा-2021 से जुड़ा है। जेपीएससी की विज्ञापन संख्या 01/2021 के तहत चंचला कुमारी ने परीक्षा दी थी। उन्होंने प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दस्तावेज सत्यापन और साक्षात्कार में हिस्सा लिया।
दस्तावेज सत्यापन के दौरान चंचला ने 27 मार्च 2019 को जारी जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उनके पति का नाम दर्ज था। जेपीएससी के निर्देश पर उन्होंने अगले दिन पिता के नाम के आधार पर जारी 9 मई 2022 का दूसरा जाति प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किया। इसके बावजूद 31 मई 2022 को जारी परिणाम में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
मार्क्स स्टेटमेंट में आवेदन अस्वीकार करने की वजह यह बताई गई कि चंचला ने प्रारंभिक परीक्षा में एससी वर्ग का लाभ लिया था, जबकि अपलोड किया गया जाति प्रमाणपत्र पति के आधार पर जारी हुआ था। हालांकि, उन्होंने कुल 590 अंक हासिल किए थे, जबकि एससी वर्ग का कटऑफ 583 अंक था। उनके अंक अंतिम चयनित एससी अभ्यर्थी से भी अधिक थे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि चंचला ने जाति प्रमाणपत्र के लिए 4 जनवरी 2019 को आवेदन किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 25 फरवरी 2019 को अधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र पिता के नाम के आधार पर जारी करने का निर्देश दिया था। हालांकि, यह निर्देश चंचला के आवेदन के बाद जारी हुआ था। इसके बावजूद कोडरमा के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) ने 27 मार्च 2019 को पति के नाम के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया।
अदालत ने कहा कि सरकारी निर्देश के पालन में यदि कोई गलती हुई है तो उसके लिए अभ्यर्थी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि 25 फरवरी 2019 का सरकारी पत्र न तो राजपत्र में प्रकाशित हुआ था और न ही उसे कानून, नियम, विनियम, अधिसूचना या सरकारी संकल्प का वैधानिक दर्जा प्राप्त था। इसलिए केवल इस पत्र के आधार पर बाद में जारी जाति प्रमाणपत्र को अमान्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने दोनों जाति प्रमाणपत्रों की तुलना में पाया कि 27 मार्च 2019 और 9 मई 2022 को जारी प्रमाणपत्रों में चंचला का स्थायी पता और जाति समान थी। अदालत के अनुसार यह ऐसा मामला नहीं था, जिसमें विवाह के बाद पति की जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ लेने का प्रयास किया गया हो। बाद के प्रमाणपत्र में केवल पति के स्थान पर पिता का नाम दर्ज किया गया था, जबकि जाति और स्थायी निवास में कोई बदलाव नहीं हुआ था।
जेपीएससी की ओर से दलील दी गई कि आवेदन के समय पिता के नाम वाला जाति प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था और बाद में नया प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना विज्ञापन की शर्तों में बदलाव के समान होगा। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

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