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Home»राज्य»झारखंड»एनयूएसआरएल में न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा स्मृति व्याख्यान, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा “पर्यावरणीय न्याय एक संवैधानिक अनिवार्यता”
झारखंड

एनयूएसआरएल में न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा स्मृति व्याख्यान, न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने कहा “पर्यावरणीय न्याय एक संवैधानिक अनिवार्यता”

Super_UserBy Super_UserMarch 28, 2026No Comments2 Mins Read
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रांची: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची में शनिवार, 28 मार्च 2026 को 4th न्यायमूर्ति एस. बी. सिन्हा स्मृति व्याख्यान सफलतापूर्वक आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के प्लेनरी हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में न्यायपालिका, शिक्षाविदों और विधि समुदाय के गणमान्य सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित माननीय श्रीमती न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना, न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय ने “पर्यावरणीय न्याय एवं जलवायु परिवर्तन: न्यायालय किस प्रकार आगे का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं” विषय पर व्याख्यान दिया।
अपने प्रभावशाली संबोधन में उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय न्याय केवल एक नीतिगत मुद्दा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक अनिवार्यता है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि न्यायालयों को संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या के माध्यम से पर्यावरणीय शासन को दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
उन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय पर्यावरणीय न्यायशास्त्र के विकास पर प्रकाश डालते हुए सतत विकास, प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, सावधानी सिद्धांत, पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत तथा अंतर-पीढ़ी समानता जैसे प्रमुख सिद्धांतों की विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय मामलों में न्यायालयों को भविष्य उन्मुख, सावधानीपूर्ण और संदर्भ-संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय न्याय सामाजिक न्याय से गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि पर्यावरणीय क्षति का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ता है। उन्होंने पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और जनसहभागिता को पर्यावरणीय निर्णय-प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित माननीय न्यायमूर्ति एम. एस. सोनक, मुख्य न्यायाधीश, झारखंड उच्च न्यायालय एवं कुलाधिपति, एनयूएसआरएल ने अपने संबोधन में कहा कि “मानव के बनाए कानूनों में अपील की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन प्रकृति के कानूनों में केवल परिणाम होते हैं।”

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