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Home»राज्य»झारखंड»खलारी पिपरवार में विस्थापितों के नाम पर टेरर फंडिंग का खूनी खेल…विस्थापित अब भी बेहाल
झारखंड

खलारी पिपरवार में विस्थापितों के नाम पर टेरर फंडिंग का खूनी खेल…विस्थापित अब भी बेहाल

avnpostBy avnpostJune 8, 2026Updated:June 8, 2026No Comments4 Mins Read
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  • NIA की नाक के नीचे हर माह करोड़ों रुपयों की हो।रही अवैध उगाही

  • टेरर फंडिंग की जांच कर रही NIA से कैसे बच निकल रहे हैं विस्थापित मंच के नेता

​ झारखंड के कोयला अंचलों से एक ऐसी सनसनीखेज सच्चाई सामने आई है जिसने पूरे पुलिस और प्रशासनिक अमले को हिलाकर रख दिया है। कोयला क्षेत्र के विस्थापितों के नाम पर टेरर फंडिंग का खूनी खेल चल रहा है. NIA टेरर फंडिंग की जांच कर रही है लेकिन NIA की नाक के नीचे अवैध उगाही का यह खेल चल रहा है. आखिर NIA की नजरें इन अलग अलग विस्थापित मंच के नेताओं पर क्यों नहीं जा रहीं यह बड़ा सवाल है जबकि पूरे इलाके में इन विस्थापित नेताओं की दहशत बढ़ती जा रही है. वहीं दूसरी तरफ विस्थापन के शिकार लोगों के हालात दिनों दिन बदतर होते जा रहे हैं.

*केवल पिपरवार क्षेत्र से कोल डंप कमिटी कर रही करोड़ों की उगाही*

पिपरवार क्षेत्र की अशोका कोयला परियोजना इस वक्त विकास नहीं, बल्कि खौफ और जबरन वसूली का सबसे बड़ा अड्डा बन चुकी है। चौंकाने वाला खुलासा यह है कि यहाँ ‘टेरर फंडिंग’ और करोड़ों की अवैध वसूली का धंधा किसी छुप-छुपाकर नहीं, बल्कि खुलेआम ‘कोल डंप कमेटी’ के बैनर तले फल-फूल रहा है. अशोका परियोजना से हर माह 50 हजार टन से ज्यादा कोयले का उठाव होता है. कोल डंप कमिटी को इस एवज में 205 रुपए प्रति टन का टेरर फंडिंग किया जाता है जिसमें सीसीएल अधिकारियों से लेकर नक्सली संगठनों तक का हिस्सा बना हुआ है. हिसाब लगा लीजिए केवल एक परियोजना से 1 करोड़ से ऊपर की उगाही की जा रही है.

*​विस्थापितों के नाम पर धोखा: किसका जेब भर रहा है आपका पैसा?*

​दिखावे के लिए इस कमेटी का गठन प्रभावित विस्थापितों और ट्रक ऑपरेटरों के कल्याण के लिए किया गया था। लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई बेहद खौफनाक है। सूत्रों के मुताबिक, इस कमेटी की आड़ में हर महीने करोड़ों रुपये की लेवी (अवैध वसूली) सीधे उग्रवादियों और अपराधियों की जेब में जा रही है।

*टेरर फंडिंग की 205 रुपए प्रति टन ​वसूली का ‘रेट चार्ट’ आया सामने:*

​ इस वसूली के खेल में नक्सलियों (TSPC) के लिए ₹60, पुलिस के नाम पर ₹40, सीसीएल अधिकारियों के नाम पर ₹35, कमेटी के गुर्गों के लिए ₹15 और यहाँ तक कि कथित पत्रकारों के नाम पर भी ₹5 प्रति टन का बंदरबांट तय है!

*​गुंडागर्दी और दहशत: व्यापारियों पर फायरिंग!*

​यह सिर्फ पैसों की उगाही का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे खूनी खेल भी शामिल है। दिसंबर 2025 में इस अवैध वसूली का विरोध करने पर ‘बिहार फाउंड्री कंपनी’ के काम को जबरन ठप करा दिया गया था और उनके कर्मियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गई थीं, जिसमें कर्मचारी बाल-बाल बचे थे। दहशत का आलम यह है कि व्यापारी अब यहाँ काम करने से डर रहे हैं।

*​खुलेआम घूम रहे हैं सरगना, फिर भी कार्रवाई क्यों नहीं?*

​इलाके के बच्चे-बच्चे को पता है कि कांटा संख्या 01, 02, 04, 06 और 07 पर कौन-कौन से रसूखदार और आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग इस अवैध वसूली को लीड कर रहे हैं। इनमें से कई तो नक्सली संगठनों को सहयोग देने के आरोप में जेल की हवा भी खा चुके हैं। इसके बावजूद प्रशासन के हाथ खाली हैं, जिससे यह बड़ा सवाल उठता है कि आखिर इन माफियाओं को किसका संरक्षण प्राप्त है?

*अशोका परियोजना के काँटा पर इनका है कब्जा*

इलाके में कोयला कारोवारी से लेकर पुलिस तक जानती है कि कांटा संख्या 1 और 2 पर महेंद्र गंझू और आशिक अली का कब्जा है.

कांटा संख्या 4 पर विजय महतो और अमर महतो हैं टेरर फंडिंग के मोहरे

कांटा संख्या 6 पर शकील अंसारी और कांटा संख्या 7 से रंथु गंझू का नाम अवैध वसूली में चर्चा में है.

*अगले भाग में पढ़िए एन के एरिया के पांच प्रोजेक्ट डकरा, केडीएच , पूरनाडीह, रोहणी और चूरी का काला खेल*

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