रांची: नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (NUSRL), रांची के तहत संचालित प्रोजेक्ट “विचाराधीन कैदियों को विधिक सहायता सेवाएँ एवं सतत विधिक शिक्षा” ने आज 14 मई 2026 को विचाराधीन (अंडर ट्रायल) कैदियों को विधिक सहायता प्रदान करने में आने वाली चुनौतियों पर एक दिवसीय परामर्श कार्यक्रम का सफलतापूर्वक आयोजन किया।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य था — विचाराधीन कैदियों को समय पर जमानत मिल सके, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जा सके तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़कर उन्हें सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सके।
कार्यक्रम में झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) की सदस्य सचिव कुमारी रंजना अस्थाना, सहायक महानिरीक्षक (AIG) कारागार श्री तुषार रंजन गुप्ता, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. अशोक आर. पाटिल, NALSAR की कार्यक्रम समन्वयक सुश्री सारंगा उगलमुगले एवं रांची व खूँटी के LADC प्रतिनिधि तथा विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। कार्यक्रम में लगभग 50 प्रतिभागियों ने भाग लिया जिनमें शिक्षाविद, विधिक पेशेवर, छात्र एवं विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल रहे। कार्यक्रम में जमानत की प्रक्रिया, विधिक प्रतिनिधित्व, न्यायालय में पेशी, कारागारों में क्षमता से अधिक कैदी और विधिक अधिकारों के प्रति जागरूकता की कमी जैसे ज्वलंत मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हुई।
कारागारों में कैदियों की बढ़ती संख्या एक गंभीर समस्या है जिसके लिए राज्य द्वारा केंद्रित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। गरीबी, जागरूकता का अभाव और निरक्षरता विचाराधीन कैदियों को समय पर जमानत दिलाने में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। झारखंड में अधिकांश विचाराधीन कैदी आदिवासी, ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से हैं, जिससे न्याय तक पहुँच और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
कारागार प्रशासन के मामले में झारखंड कई राज्यों की तुलना में आगे है। जेल की कुल आबादी में लगभग 70 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जबकि केवल 30 प्रतिशत ही दोषसिद्ध होकर सज़ा काट रहे हैं। विचाराधीन कैदियों के लिए और अधिक काम करने की ज़रूरत है। हमारा पूरा प्रयास रहता है कि इन कैदियों तक ज़रूरी मदद पहुँचाई जा सके। विश्वविद्यालय अपने विभिन्न केंद्रों के माध्यम से शिक्षा के साथ-साथ समाज और कानून के दूसरे पहलुओं में भी मदद पहुँचाने का प्रयास कर रहा है। विधिक सहायता कोई दान नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 39-क से उत्पन्न संवैधानिक दायित्व है। विचाराधीन कैदियों को प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व और समय पर सहायता सुनिश्चित करना, आपराधिक न्याय प्रणाली में निष्पक्षता, समानता और गरिमा के सिद्धांतों की रक्षा के लिए अनिवार्य है।
