Ranchi: भारत के राजनैतिक और वैचारिक परिदृश्य में पंडित दीनदयाल उपाध्याय वह नाम हैं, जिन्होंने राष्ट्र को केवल राजनीति नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का एक ऐसा दृष्टिकोण दिया जो भारतीय संस्कृति और आत्मनिर्भरता पर आधारित था। उनका एकात्म मानववाद भारतीय चिंतन की आत्मा है, जिसमें व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने की गहरी दृष्टि है। आज जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हैं, तब उपाध्याय जी का दर्शन और भी प्रासंगिक हो जाता है।
एकात्म मानववाद : स्वदेशी चिंतन की धुरी
20वीं सदी के उत्तरार्ध में जब दुनिया साम्यवाद और पूँजीवाद की खींचतान में उलझी थी, तब उपाध्याय जी ने एकात्म मानववाद का प्रतिपादन किया। यह न तो साम्यवाद की तरह व्यक्ति को समाज में विलीन करता है और न ही पूँजीवाद की तरह व्यक्ति को स्वार्थी उपभोक्ता बनाता है। उनकी दृष्टि में व्यक्ति केवल शरीर और बुद्धि नहीं, बल्कि आत्मा और संस्कारों से युक्त संपूर्ण मानव है। यही दर्शन आत्मनिर्भर और स्वदेशी व्यवस्था का आधार है।
उन्होंने कहा—“भारत का मार्ग न तो पूँजीवाद है, न साम्यवाद; भारत का मार्ग एकात्म मानववाद है।” इसका आशय था कि हमारी राजनीति, अर्थनीति और सामाजिक जीवन भारतीय संस्कृति और परंपराओं से प्रेरित होना चाहिए।
आर्थिक लोकतंत्र और अंत्योदय
उपाध्याय जी का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता से जुड़ी हो। उन्होंने कहा—“लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह है कि समाज का अंतिम व्यक्ति कितना सशक्त हुआ।”
यही सोच अंत्योदय की अवधारणा में प्रकट होती है। उनके अनुसार विकास का मूल्यांकन केवल बड़े उद्योगों की उत्पादन क्षमता से नहीं, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति की उन्नति से होना चाहिए जो गरीबी और अभाव से जूझ रहा है। यह विचार आज के कल्याणकारी राज्य और आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला है।
स्वदेशी उद्योग और ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था
दीनदयाल जी का जोर छोटे और कुटीर उद्योगों पर था। उनका मानना था कि ग्राम आधारित उद्योग ही भारत की रीढ़ हैं। यदि हम विदेशी पूँजी और बड़े उद्योगों पर आश्रित रहेंगे, तो आत्मनिर्भरता केवल नारा बनकर रह जाएगी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत का विकास पश्चिमी अनुकरण से नहीं, बल्कि अपनी परंपरागत ग्राम अर्थव्यवस्था और स्वदेशी उद्योगों के पुनर्निर्माण से होगा। यही विचार आज ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी नीतियों में दृष्टिगोचर होता है।
योजनाओं की भारतीय दृष्टि
पंडित जी ने पंचवर्षीय योजनाओं की पश्चिमी ढांचे की आलोचना करते हुए कहा कि योजनाएँ तभी सफल होंगी जब वे भारतीय समाज की आवश्यकताओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से मेल खाएँ। उनका मानना था कि योजनाओं का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि समाज में समान अवसर, न्याय और आत्मनिर्भरता पैदा करना होना चाहिए।
उनके अनुसार—“योजना वही है जो भारतीय परिस्थितियों और ग्राम जीवन के अनुकूल हो।” आज आत्मनिर्भर भारत अभियान इसी दिशा में योजनाओं को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास है।
स्वयंसेवी क्षेत्र और जनभागीदारी
दीनदयाल जी ने माना कि आत्मनिर्भर समाज केवल सरकार पर आश्रित होकर नहीं बन सकता। इसके लिए स्वयंसेवी संगठनों और जनभागीदारी की अहम भूमिका है। उन्होंने कहा कि समाज की सच्ची शक्ति जनता के सहयोग से ही प्रकट होती है।
आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में जब तक जनसहयोग और सामाजिक सहभागिता नहीं होगी, तब तक आत्मनिर्भरता अधूरी है।
