आदिवासी खाता 65 की जमीन के जाली दस्तावेजों पर बन रहा G+14 अपार्टमेंट
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एक ही जमीन कई बार गैर आदिवासी को हस्तांतरित
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पहले 1939 में किया गया इस्तीफा कबूलियत, उसके बाद फिर 1985-1990 के बीच किया गया कंपनसेशन
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क्या कंपनसेशन के समय आदिवासियों के खाते में भेजे गए रुपए..?
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जांच हुई तो जमीन माफिया चितरंजन, विक्रम जैन समेत कई की संलिप्तता का होगा खुलासा
माननीय मंत्री दीपक बिरुआ जी…बचा लीजिए जगतपुरम की आदिवासी जमीन. जगतपुरम कॉलोनी के भीतर भीठा मौजा की खाता नम्बर 65 का प्लॉट नम्बर 122. यह जमीन आदिवासियों की जमीन है जिसका खतियान आज भी मौजूद है लेकिन इस जमीन पर G + 14 फ्लोर की इमारत खड़ी की जा रही है और भोले भाले पाहन आदिवासी टकटकी लगाए मंत्री जी और सरकार की तरफ देख रहे हैं. जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ रहे सीएम हेमंत सोरेन और आदिवासियों के आंदोलन पर जमीन माफिया कैसे कब्जा करते जा रहे हैं इसका सटीक उदाहरण है खाता 65 पर माफियाओं का खेल.

खतियान में बुकरा मुंडा…1939 में इस्तीफा तब कैसे हुआ कंपनसेशन
जगतपुरम के भीठा मौजा स्थित खाता नम्बर 65 की करीब 4 एकड़ जमीन खतियान में बुकरा मुंडा के नाम से दर्ज है लेकिन जब इस खाता का पंजी 2 देखियेगा तो चौंक जाइयेगा. कई गैरआदिवासियों के नाम से म्यूटेशन करा लिया गया है. दस्तावेज बताते हैं कि पहले 1939 में जमीन का इस्तीफा कबूलियत कराया गया और उसके रजिस्टर्ड दस्तावेज आज भी मौजूद हैं. उसके बाद फिर से उन्हीं इस्तीफा देने वाले आदिवासियों से 1985 से 1990 के बीच जमीन का कंपनसेशन कराया गया. उसके बाद इसकी फिर से रजिस्ट्री की गई. अधिकांश जमीनों का म्यूटेशन पूर्व कांके सीओ जयकुमार राम के समय किया गया जिनपर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप हैं और ईडी मामले की जांच कर रही है.

अधिकांश कंपनसेशन भूमाफिया चितरंजन के करीबियों के नाम
उक्त जमीन के कंपनसेशन के दस्तावेजों की अगर जांच हो जाए तो यकीन मानिए SAR कोर्ट के चपरासी, वकील, पूर्व बैंककर्मी और भूमाफियाओं की साजिश का ऐसा भंडाफोड़ होगा जो राज्य सरकार को होने वाले करोड़ों के राजस्व के नुकसान का खुलासा करेगा. 1985 से 1990 के बीच जिनके नाम से कंपनसेशन करवाए गए हैं वो सभी जगतपुरम के चर्चित भूमाफिया चितरंजन के करीबी लोग हैं. बाद में विक्रम जैन के कुनबे को चितरंजन के द्वारा जमीन की।बिक्री की गई.

क्या है कंपनसेशन के नियम?
कंपनसेशन में जो मुख्य नियम है उसके अनुसार आदिवासी जमीन मालिकों के खाते में SAR (विशेष विनिमय पदाधिकारी) द्वारा तय निर्धारित राशि का भुगतान किया जाता है. माननीय मंत्री दीपक बिरुआ जी एक बार जांच करा लीजिए कि क्या 1985 से 1990 के बीच आदिवासियों के खाते में भुगतान किया गया था? अगर किया गया था तो उसका म्यूटेशन क्यों सालों तक लंबित रखा गया? जब आदिवासियों ने 1939 में ही जमीन पर इस्तीफा कबूलियत करते हुए जमीन पुनः जमींदार को सौंप दी थी तब 1985 में फिर से आदिवासियों ने ही कैसे जमीन पर मुआवजा ले लिया? दरअसल , जो जानकारियां मिल रही हैं उसके अनुसार दोनों ही दस्तावेज फर्जी हैं. आदिवासियों को औने पौने दाम देकर 2015 के बाद जमीन पर कब्जा किया गया था.
